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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वरुण का क्रोध प्रचण्ड है।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे आत्मा !] (यत्) जो (बहु) बहुत सा (अनृतम्) असत्य और (वृजिनम्) पाप (जिह्वया) जिह्वा से (उवक्थ) तू बोला है। (अहम्) मैं (त्वा) तुझको (सत्यधर्मणः) सच्चे धर्मात्मा वा न्यायी, (वरुणात्) सबमें श्रेष्ठ परमेश्वर (राज्ञः) राजा से (मुञ्चामि) छुड़ाता हूँ ॥३॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य मिथ्यावादी दुराचारी भी होकर उस प्रभु की शरण लेते और सत्कर्मों में प्रवृत्त होते हैं, वे लोग उस जगदीश्वर की न्यायव्यवस्था के अनुसार दुःखपाश से छूटकर आनन्द भोगते हैं ॥३॥
टिप्पणी: ३−यत्। वचनम्। उवक्थ। ब्रूञ् व्यक्तायां वाचि-लिट्, त्वम् उक्तवानसि। अनृतम्। न ऋतम्। असत्यं। मिथ्याभाषणम्। जिह्वया। शेवायह्वजिह्वाग्रीवाऽप्वामीवाः। उ०। १।१५४। इति जि जये-वन्, हुक् आगमे निपातितः। जयति रसमनया। रसनया। वृजिनम्। वृजेः किच्च। उ० २।४७। इति वृजी वर्जने-इनच्, स च कित्। पापम्। बहु। अधिकम्। राज्ञः। म० १। अध्यक्षात्। त्वा। त्वाम्। सेवकम्, आत्मानम्। सत्य-धर्मणः। धर्मादनिच् केवलात्। पा० ५।४।१२४। इति सत्य+धर्म+अनिच्, बहुव्रीहौ। यथार्थन्यायस्वभावात् मुञ्चामि। मुच्लृ मोक्षे-लट्। मोचयामि, वियोजयामि। वरुणात्। म० १। श्रेष्ठात् परमेश्वरात्। अहम्। उपासकः ॥
