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यदन्ति॒ यच्च॑ दूर॒के भ॒यं वि॒न्दति॒ मामि॒ह । पव॑मान॒ वि तज्ज॑हि ॥

English Transliteration

yad anti yac ca dūrake bhayaṁ vindati mām iha | pavamāna vi taj jahi ||

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Pad Path

यत् । अन्ति॑ । यत् । च॒ । दू॒र॒के । भ॒यम् । वि॒न्दति॑ । माम् । इ॒ह । पव॑मान । वि । तत् । ज॒हि॒ ॥ ९.६७.२१

Rigveda » Mandal:9» Sukta:67» Mantra:21 | Ashtak:7» Adhyay:2» Varga:17» Mantra:1 | Mandal:9» Anuvak:3» Mantra:21


ARYAMUNI

Word-Meaning: - (पवमान) सबको पवित्र करनेवाले परमात्मन् ! आप (मामिह) मुझको इस संसार में (यद्) जो (भयं) भय (विन्दन्ति) प्राप्त हैं (च) और (यद्) जो विघ्न (अन्ति) मेरे समीप तथा (दूरके) दूर हैं (तत्) उनको (विजहि) सर्वथा नाश करें ॥२१॥
Connotation: - इस मन्त्र में परमात्मा से भय और विघ्नों के नाश करने की प्रार्थना की गयी है ॥२१॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

इहलोक व परलोक सम्बद्धमय का विनाश

Word-Meaning: - [१] हे (पवमान) = पवित्र करनेवाले सोम ! (यद्) = जो (अन्ति) = इस समीपस्थ लोक-विषयक 'शरीर रोग' आदि का (भयम्) = भय (माम्) = मुझे (इह) = इस जीवन में (विन्दति) = प्राप्त होता है, तू (तत्) = उसे (विजहि) = विनष्ट कर । गत मन्त्र के अनुसार तू 'रक्षोहा' है, इन रोगकृमि रूप राक्षसों को तू विनष्ट कर । [२] (यत् च) = और जो दूरके दूरके, परलोक के विषय में भय मुझे प्राप्त होता है, उस 'काम-क्रोध-लोभ' से आक्रान्त होने के कारण परत्र अशुभ गति के भय को भी तू ही नष्ट कर । काम, क्रोध, लोभ आदि राक्षसी भावों का भी विनाशक तू ही है।
Connotation: - भावार्थ - रोगकृमियों को नष्ट करके सोम ऐहिक भय को समाप्त करता है और काम- -क्रोध- लोभ को समाप्त करके आमुष्यिक भय को दूर करता है । सोमरक्षण से उभयलोक का कल्याण होता है । एवं शरीर मन में पवित्र बना हुआ यह 'पवित्र' कहता है कि-

ARYAMUNI

Word-Meaning: - (पवमान) सर्वपवित्रयितः परमात्मन् ! (मामिह) मामस्मिन् संसारे (यत् भयम्) यत्किमपि भयं (विन्दति) प्राप्तं वर्तते (च) अथ च (यत्) यद्विघ्नं (अन्ति) सन्निकटं वर्तते तथा (दूरके) दूरमस्ति (तत्) तान् (विजहि) सर्वथा नाशय ॥२१॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - O Soma, pure and purifying spirit of divinity, whatever fear there be that is far distant or that which is close at hand and assails me here, pray dispel and destroy the same.