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अच्छा॒ कोशं॑ मधु॒श्चुत॒मसृ॑ग्रं॒ वारे॑ अ॒व्यये॑ । अवा॑वशन्त धी॒तय॑: ॥

English Transliteration

acchā kośam madhuścutam asṛgraṁ vāre avyaye | avāvaśanta dhītayaḥ ||

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Pad Path

अच्छ॑ । कोश॑म् । म॒धु॒ऽश्चुत॑म् । असृ॑ग्रम् । वारे॑ । अ॒व्यये॑ । अवा॑वशन्त । धी॒तयः॑ ॥ ९.६६.११

Rigveda » Mandal:9» Sukta:66» Mantra:11 | Ashtak:7» Adhyay:2» Varga:9» Mantra:1 | Mandal:9» Anuvak:3» Mantra:11


ARYAMUNI

यहाँ सर्वाधिकरणत्व से परमात्मा की स्तुति करते हैं।

Word-Meaning: - जिस परमात्मा ने इस संसार को (अच्छ) निर्मल और (कोशम्) सर्वनिधान तथा (मधुश्चुतम्) आनन्ददायक (असृग्रम्) रचा है, उसी (अव्यये) अविनाशी तथा (वारे) वरणीय परमात्मा में (धीतयः) सृष्टियाँ (अवावशन्त) निवास करती हैं ॥११॥
Connotation: - परमात्मा ही एकमात्र सर्व लोक-लोकान्तरों का अधिकरण है ॥११॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

आनन्दमयकोश की ओर

Word-Meaning: - [१] (वारे) = जिससे सब वासनाओं का निवारण किया गया है, (अव्यये) = [अवि अय्] 'जो विविध विषयों की ओर नहीं जा रहा', ऐसे हृदय के होने पर (मधुश्चुतं कोशम् अच्छा) = माधुर्य को टपकानेवाले आनन्दयमकोश का लक्ष्य करके सोम धारायें असृग्रम् उत्पन्न की जाती हैं। हृदय की पवित्रता के होने पर ही सोम का रक्षण होता है, और रक्षित सोम आनन्द वृद्धि का कारण बनता है । [२] (धीतयः) = सोम का अपने अन्दर पान करनेवाले लोग (अवावशन्त) = अपने शोधन के लिये इस सोम की सदा कामना करते हैं। ये शरीर में सुरक्षित रहता है, तभी जीवन सर्वथा पवित्र बना रहता है, शरीर रोगों से मलिन नहीं होता, मन वासनाओं से अपवित्र नहीं होता और बुद्धि भी दीप्त बनी रहती है।
Connotation: - भावार्थ - शरीर में सुरक्षित सोम आनन्द वृद्धि का कारण बनता है। इसके रक्षण से जीवन पवित्र होता है।

ARYAMUNI

अथ सर्वाधिकरणत्वेन परमात्मा स्तूयते।

Word-Meaning: - येन परमात्मना (अच्छ) निर्मलं (कोशम्) सर्वनिधानं तथा (मधुश्चुतम्) आनन्ददायकं जगदिदं (असृग्रम्) रचितमस्ति तस्मिन् (अव्यये) अविनाशिनि (वारे) वरणीये परमात्मनि (धीतयः) सृष्टयः (अवावशन्त) निवसन्ति ॥११॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - The honey sweet nectar of soma ecstasy created and vibrating in the presence of the supreme imperishable eternal spirit, the yogi’s thoughts and words exalt in celebration.