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यो जि॒नाति॒ न जीय॑ते॒ हन्ति॒ शत्रु॑म॒भीत्य॑ । स प॑वस्व सहस्रजित् ॥

English Transliteration

yo jināti na jīyate hanti śatrum abhītya | sa pavasva sahasrajit ||

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Pad Path

यः । जि॒नाति॑ । न । जीय॑ते । हन्ति॑ । शत्रु॑म् । अ॒भि॒ऽइत्य॑ । सः । प॒व॒स्व॒ । स॒ह॒स्र॒ऽजि॒त् ॥ ९.५५.४

Rigveda » Mandal:9» Sukta:55» Mantra:4 | Ashtak:7» Adhyay:1» Varga:12» Mantra:4 | Mandal:9» Anuvak:2» Mantra:4


ARYAMUNI

Word-Meaning: - (यः जिनाति) जो आप सकल ब्रह्माण्डगत पदार्थों को आयुरहित कर देते हैं और (न जीयते) स्वयं कदापि निरायुष नहीं होते तथा (शत्रुम् अभीत्य हन्ति) जो आप अपनी व्याप्ति द्वारा शत्रुओं की शक्तियों को हर लेते हैं और स्वयं अहार्य शक्तिवाले हैं (सहस्रजित्) वह सर्वोपरिशक्तिसम्पन्न आप (पवस्व) हमको सुरक्षित करिये ॥४॥
Connotation: - काल सब पदार्थों के आयु को क्षय करके आप स्वयं अविनाशी बना रहता है, परन्तु काल का अविनाशित्व भी सापेक्ष है अर्थात् अनित्य पदार्थों की अपेक्षा काल को नित्य कहा जाता है, परन्तु परमात्मा की अपेक्षा से काल भी अनित्य है, इसलिए परमात्मा सर्वोपरि कूटस्थ नित्य है। उसी की उपासना मनुष्य को शुद्ध हृदय से करनी चाहिये ॥४॥ यह ५५ वाँ सूक्त और १२ वाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

यो जिनाति न जीयते

Word-Meaning: - [१] हे सोम ! (यः) = जो तू (जिनाति) = शत्रुओं का नाश करता है और (न जीयते) = रोगकृमि रूप शत्रुओं से कभी आक्रान्त नहीं होता । आक्रान्त होना तू दूर रहा, (शत्रुं समीत्य) = शत्रुओं पर आक्रमण करके (हन्ति) = उनका नाश करता है । (सः) = यह तू (सहस्त्रजित् शतशः) = शत्रुओं का विजेता (पवस्व) = हमें प्राप्त हो। [२] शरीर में सोम के रक्षित होने पर यह सोम शरीर में सब रोगकृमि व वासना रूप शत्रुओं का विनाश करता है। यह रोगकृमियों पर आक्रमण करके उन्हें विनष्ट कर देता है। इस प्रकार यह सोम हमारे लिये सब आवश्यक वसुओं का विजेता बनता है।
Connotation: - भावार्थ - हे सोम ! तू हमारे शत्रुओं का विनाश करके हमारे लिये शतशः वसुओं का विजेता बन । अगला सूक्त भी 'अवत्सार' ऋषि का ही है-

ARYAMUNI

Word-Meaning: - (यः जिनाति) यो हि भवान् सकलब्रह्माण्डान्तर्गत- पदार्थानायुरहितान् करोति अथ च (न जीयते) स्वयमायुरहितः कदापि न भवति। तथा (शत्रुम् अभीत्य हन्ति) यो हि स्वव्यापनशीलशक्त्या वैरिबलमपहरति परं स्वयमहरणीय- शक्तिमानस्ति (सहस्रजित्) स सर्वोपरिशक्तिसम्पन्नस्त्वं (पवस्व) मां सुरक्षय ॥४॥ इति पञ्चपञ्चाशत्तमं सूक्तं द्वादशो वर्गश्च समाप्तः ॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - You, who always excel, win or vanquish, who no one can excel, win or vanquish, who advance and destroy the destructive adversary, pray advance, energise, purify and empower us too, winner of a thousand battles.