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श॒तं न॑ इन्द ऊ॒तिभि॑: स॒हस्रं॑ वा॒ शुची॑नाम् । पव॑स्व मंह॒यद्र॑यिः ॥
English Transliteration
Mantra Audio
śataṁ na inda ūtibhiḥ sahasraṁ vā śucīnām | pavasva maṁhayadrayiḥ ||
Pad Path
श॒तम् । नः॒ । इ॒न्दो॒ इति॑ । ऊ॒तिऽभिः॑ । स॒हस्र॑म् । वा॒ । शुची॑णाम् । पव॑स्व । मं॒ह॒यत् ऽर॑यिः ॥ ९.५२.५
Rigveda » Mandal:9» Sukta:52» Mantra:5
| Ashtak:7» Adhyay:1» Varga:9» Mantra:5
| Mandal:9» Anuvak:2» Mantra:5
ARYAMUNI
Word-Meaning: - (इन्दो) हे परमात्मन् ! (मंहयद्रयिः) आप हमारे धनादि ऐश्वर्य बढ़ाते हुए (ऊतिभिः) रक्षा के लिये (शुचीनां शतम् न सहस्रम् वा) पवित्र सैंकड़ों तथा सहस्त्रों शक्तियों को (पवस्व) उत्पन्न करिये ॥५॥
Connotation: - परमात्मा ने मनुष्य के ऐश्वर्य के लिए सैंकड़ों और सहस्त्रों शक्तियों को उत्पन्न किया है। मनुष्य को चाहिए कि कर्मयोगी बनकर उन शक्तियों का लाभ करे ॥५॥ यह ५२ वाँ सूक्त और ९ वाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
HARISHARAN SIDDHANTALANKAR
'मंहयद्रयि' सोम
Word-Meaning: - [१] हे (इन्दो) = हमें शक्तिशाली बनानेवाले सोम ! तू (मंहयद्रयिः) = सब धनों का देनेवाला है [मंहतेर्दानकर्मण:] । प्रथम मन्त्र में 'सनद्रयिः ' शब्द से इसी भाव को व्यक्त किया गया था। ऐसा तू (नः) = हमें (ऊतिभिः) = रक्षणों के हेतु से (शुचीनाम्) = अपने पवित्र बलों के (शतं सहस्रं वा) = सैंकड़ों व हजारों को (पवस्व) = प्राप्त करा । [२] वस्तुतः सोम ही शरीर के सब कोशों को ऐश्वर्य से परिपूर्ण करता है, यही 'सनद्रयि मंहयद्रयि' है। यही हमें पवित्र बलों को प्राप्त कराता है, उन बलों को जिनसे कि हम अपना रक्षण कर पाते हैं।
Connotation: - भावार्थ- सुरक्षित सोम हमें सब ऐश्वर्यों व बलों को प्राप्त कराता है । इस बलों के देनेवाले सोम का रक्षक पुरुष 'अवत्सार' कहलाता है। यह इस सब भोजनों के सारभूत सोम का अवन [रक्षण] करता है। यह सोम के लिये कहता है कि-
ARYAMUNI
Word-Meaning: - (इन्दो) हे विश्वकर्तः ! (मंहयद्रयिः) त्वं मदैश्वर्यादीन् वर्धयन् (ऊतिभिः) रक्षार्थं अत्र “चतुर्थ्यर्थे तृतीया भवति” (शुचीनां शतम् न सहस्रम् वा) पूताः शतसहस्रशक्तीः (पवस्व) उत्पादय ॥५॥ इति द्विपञ्चाशत्तमं सूक्तं नवमो वर्गश्च समाप्तः ॥
DR. TULSI RAM
Word-Meaning: - O lord of light, purity and plenty, with divine powers and protections bless us with hundreds and thousands of life’s purities and shower upon us abundance of wealth, honour and excellence worthy of that purity.
