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न॒प्तीभि॒र्यो वि॒वस्व॑तः शु॒भ्रो न मा॑मृ॒जे युवा॑ । गाः कृ॑ण्वा॒नो न नि॒र्णिज॑म् ॥

English Transliteration

naptībhir yo vivasvataḥ śubhro na māmṛje yuvā | gāḥ kṛṇvāno na nirṇijam ||

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Pad Path

न॒प्तीभिः॑ । यः । वि॒वस्व॑तः । शु॒भ्रः । न । म॒मृ॒जे । युवा॑ । गाः । कृ॒ण्वा॒नः । न । निः॒ऽनिज॑म् ॥ ९.१४.५

Rigveda » Mandal:9» Sukta:14» Mantra:5 | Ashtak:6» Adhyay:8» Varga:3» Mantra:5 | Mandal:9» Anuvak:1» Mantra:5


ARYAMUNI

Word-Meaning: - (यः) जो परमात्मा (विवस्वतः) विज्ञानवाले जिज्ञासु की (नप्तीभिः) चित्तवृत्तियों द्वारा (शुभ्रः) प्रकाशित होकर (युवा) समीपस्थ वस्तु के (न) समान (मामृजे) साक्षात्कार को प्राप्त होता है और वह साक्षात्कार (गाः कृण्वानः) इन्द्रियों को प्रसन्न करते हुए (निर्णिजम् न) रूप के समान होता है ॥५॥
Connotation: - जो पुरुष अपने मन को शुद्ध करते हैं, वे उस पुरुष का साक्षात्कार करते हैं। उन पुरुषों की चित्तवृत्तियें उसको हस्तामलकवत् साक्षाद्रूप से अनुभव करती हैं अर्थात् शुद्ध मन द्वारा साक्षात् किये हुए परमात्मध्यान में फिर किसी प्रकार का भी संशय व विपर्ययज्ञान नहीं होता ॥५॥३॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

ज्ञान के द्वारा सोम का शोधन सोम शुद्धि से ज्ञानदीप्ति

Word-Meaning: - [१] (यः) = जो (युवा) = हमारे सब दोषों को पृथक् करनेवाला [यु अमिश्रणे ] तथा सब गुणों को मिलानेवाला [यु मिश्रणे ] सोम है, वह (विवस्वतः) = ज्ञान के सूर्य की (नप्तीभिः) = न पतन होने देनेवाली शक्तियों से (शुभ्रः) = उज्ज्वल हुआ हुआ (न) = अब [न इति संप्रत्यर्थे] (मामृजे) = हमारे जीवनों को शुद्ध बनाता है। ज्ञान प्राप्ति में लगे रहने से वासनाओं को उबाल नहीं आता। परिणामतः सोम शरीर में सुरक्षित रहता है। सुरक्षित हुआ हुआ यह हमारे जीवनों को शुद्ध बना डालता है। [२] (न) = [न=च] और यह सोम (गाः) = ज्ञान की वाणियों को (कृण्वान:) = हमारे मस्तिष्क में दीप्त करता हुआ (निर्णिजम्) = शोधन व पोषण के लिये होता है । सोम ज्ञानाग्नि का ईंधन बनता है, ज्ञानाग्नि की दीप्ति से हम वेदवाणियों को स्पष्ट रूप में देखते हैं। ये ज्ञान की वाणियाँ हमारे जीवन को शुद्ध बनाती हैं।
Connotation: - भावार्थ- स्वाध्याय की प्रवृत्ति सोम को शुद्ध करती है। शुद्ध सोम ज्ञानाग्नि को दीप्त करता हुआ इन ज्ञान की वाणियों से हमारा शोधन करता है।

ARYAMUNI

Word-Meaning: - (यः) यः परमात्मा (विवस्वतः) विज्ञानिनो जिज्ञासोः (नप्तीभिः) चित्तवृत्तिभिः (शुभ्रः) प्रकाशमानः (युवा) समीपस्थवस्तु (न) इव (मामृजे) साक्षात्कृतो भवति स साक्षात्कारश्च (गाः कृण्वानः) इन्द्रियाणि प्रीणयन् (निर्णिजम् न) रूपमिव सम्पद्यते ॥५॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Shining as pure and radiant by the mind and senses of the ardent devotee, it joins the sage and, perfecting his mind and intelligence, reveals itself in vision as if in concentrated form and splendour.