Viewed 459 times
धा॒सिं कृ॑ण्वा॒न ओष॑धी॒र्बप्स॑द॒ग्निर्न वा॑यति । पुन॒र्यन्तरु॑णी॒रपि॑ ॥
English Transliteration
Mantra Audio
dhāsiṁ kṛṇvāna oṣadhīr bapsad agnir na vāyati | punar yan taruṇīr api ||
Pad Path
धा॒सिम् । कृ॒ण्वा॒नः । ओष॑धीः । बप्स॑त् । अ॒ग्निः । न । वा॒य॒ति॒ । पुनः॑ । यन् । तरु॑णीः । अपि॑ ॥ ८.४३.७
Rigveda » Mandal:8» Sukta:43» Mantra:7
| Ashtak:6» Adhyay:3» Varga:30» Mantra:2
| Mandal:8» Anuvak:6» Mantra:7
SHIV SHANKAR SHARMA
Word-Meaning: - हे भगवन् ! आपके उत्पादित ये (अग्नयः) सूर्य्य, विद्युत्, अग्नि और चन्द्र आदि सर्वजगत् (पृथक्) पृथक्-पृथक् (यतन्ते) स्व-स्व कार्य्य में यत्न कर रहे हैं। वे कैसे हैं−(हरयः) परस्पर हरणशील, परस्परोपकारक, पुनः (धूमकेतवः) जिनके चिह्न धूम हैं, पुनः (वातजूताः) जो स्थूल और सूक्ष्म वायुओं से प्रेरित होते हैं, पुनः (उप+द्यवि) कोई पदार्थ द्युलोक में, कोई पृथिवी पर और कोई मध्यलोक में स्व-स्व कार्य में लगे हुए हैं ॥४॥
Connotation: - उसकी महती शक्ति है, जिससे सूर्य्यादि लोकों में भी कार्य्य हो रहे हैं, हे मनुष्यों ! आप उसी की पूजा कीजिये ॥४॥
HARISHARAN SIDDHANTALANKAR
मात्रा में वानस्पतिक भोजन
Word-Meaning: - [१] (अग्निः) = प्रगतिशील जीव (धासिं कृण्वानः) = धारणात्मक भोजन को करता हुआ- अर्थात् शरीर धारण के ही लिए भोजन को ग्रहण करता हुआ, (ओषधीः बप्सत्) = ओषधि वनस्पतियों का ही भक्षण करता हुआ (न वायति) श्रान्त नहीं होता जाता । (शुष्क) ] अंग-प्रत्यंगोंवाला नहीं हो जाता। [२] और (पुनः) = फिर यह प्रगतिशील जीव इन वानस्पतिक भोजनों को करता हुआ (तरुणीः अपि यत्) = संसार सागर से तरानेवाली भावनाओं की ओर ही गतिवाला होता है।
Connotation: - भावार्थ- मात्रा में किया गया वानस्पतिक भोजन [क] शरीर को सरस अङ्ग-प्रत्यङ्गोंवाला बनाता है, और [ख] भावनाओं को उत्तम बनाता है।
SHIV SHANKAR SHARMA
Word-Meaning: - हे भगवन् ! तवोत्पादिताः। इमे। अग्नयः=सूर्य्यविद्युदग्नयः। पृथक्=पृथक्-२ यतन्ते स्वस्वकार्ये पृथक्-२ परिश्राम्यन्ति। कीदृशास्ते। हरयः=हरणशीलाः पुनः। धूमकेतवः= धूमध्वजाः। पुनः। वातजूताः=वायुप्रेरिताः। उपद्यवि। केचन द्युलोके। केचन अन्तरिक्षे। केचन पृथिव्यां यतन्ते इत्यन्वयः ॥४॥
DR. TULSI RAM
Word-Meaning: - Conducting itself into herbs and trees, making them as if a dwelling for itself, energising them and, as fire even consuming them, Agni does not feel satiated, and takes on to new budding ones on and on. (The life cycle of birth, death and rebirth, growth, decay and growth thus continues.)
