Go To Mantra
Viewed 427 times

पु॒रो॒ळाशं॒ यो अ॑स्मै॒ सोमं॒ रर॑त आ॒शिर॑म् । पादित्तं श॒क्रो अंह॑सः ॥

English Transliteration

puroḻāśaṁ yo asmai somaṁ rarata āśiram | pād it taṁ śakro aṁhasaḥ ||

Pad Path

पु॒रो॒ळाश॑म् । यः । अ॒स्मै॒ । सोम॑म् । रर॑ते । आ॒ऽशिर॑म् । पात् । इत् । तम् । श॒क्रः । अंह॑सः ॥ ८.३१.२

Rigveda » Mandal:8» Sukta:31» Mantra:2 | Ashtak:6» Adhyay:2» Varga:38» Mantra:2 | Mandal:8» Anuvak:5» Mantra:2


SHIV SHANKAR SHARMA

फिर वही विषय आ रहा है।

Word-Meaning: - ईश्वर को ही लक्ष्य करके निखिल शुभकर्म कर्तव्य हैं, यह इससे शिक्षा दी जाती है। यथा−(यः) जो उपासक (अस्मै) सर्वत्र विद्यमान इस परमात्मा को प्रथम समर्पित कर (पुरोडाशम्) दरिद्रों के आगे अन्न (ररते) देता रहता है और (सोमम्) परम पवित्र अन्न को और (आशिरम्) विविध द्रव्यों से मिश्रित अन्न को जो देता रहता है, (तम्) उसको (अंहसः) पाप से (शक्रः) सर्वशक्तिमान् ईश्वर (पात्+इत्) पालता ही है ॥२॥
Connotation: - संसार में दरिद्रता और अज्ञान अधिक हैं, इस कारण ज्ञानी पुरुष ज्ञान और धनी जन विविध प्रकार के अन्न और द्रव्य इच्छुक जनों को सदा दिया करें। ईश्वर दाताओं को सर्व दुःखों से बचाया करता है, क्योंकि वह सर्वशक्तिमान् है ॥२॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

पुरोडाश-सोम [यज्ञशेष का सेवन - सोमरक्षण]

Word-Meaning: - [१] (यः) = जो प्रभु (अस्यै) = इस जीव के लिये (पुरोडाशम्) = हुतशेष को (ररते) = देते हैं। प्रभु जीव को यही आदेश करते हैं कि वह यज्ञशेष का ही सेवन करनेवाला बने। 'केवलाधो भवति केवलादी' अकेले स्वयं ही सब खा जानेवाला तो पापी होता है। और वे प्रभु (आशिरम्) = समन्तात् शरीर में रोगकृमियों के शीर्ण करनेवाले (सोमम्) = सोम शक्ति को, वीर्य को (ररते) = देते हैं। इस सोम के रक्षण से ही तो हमारे जीवन का सारा उत्थान होना है। [२] (शक्रः) = ये सर्वशक्तिमान् प्रभु ही (तम्) = उस यज्ञशेष का सेवन करनेवाले तथा सोम का रक्षण करनेवाले पुरुष को (अंहसः) = पाप से (पात् इत्) = अवश्य बचाते ही हैं। वस्तुत: 'यज्ञशेष का सेवन व सोमरक्षण' मनुष्य को पाप की ओर झुकने ही नहीं देते।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु के आदेश के अनुसार 'यज्ञशेष का सेवन करते हुए तथा सोम का रक्षण करते हुए' हम अपने को पापों से पृथक् रखने में समर्थ हों।

SHIV SHANKAR SHARMA

पुनस्तदनुवर्तते।

Word-Meaning: - ईश्वरमेव लक्षीकृत्य शुभानि कर्माणि विद्यातव्यानीति अनया शिक्षते। यथा यः खलु उपासकः अस्मै सर्वत्र विद्यमानाय महेश्वराय। समर्प्य पुरोडाशं पुरोऽन्नं दरिद्रेभ्यो दातव्यमन्नम्। श्रद्धया पुरोऽग्रे यद्दाश्यते दीयते। तं पुरोडाशम्। ररते ददाति। यः सोमं पवित्रतमं वस्तु। ररते। यः आशिरं विविधद्रव्याणि मिश्रयित्वा परिपक्वमन्नम्। ररते। तम् उपासकम्। अंहसः पापात्। शक्रः सर्वशक्तिमान् ईशः। पात्+इत्। पात्येव ॥२॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Whoever offers food to the fire and to the deserving poor in honour of this omnipresent lord, Indra, and offers him oblations of soma mixed with fragrant havis, the lord almighty saves him from sin and evil.