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यो नो॒ रसं॒ दिप्स॑ति पि॒त्वो अ॑ग्ने॒ यो अश्वा॑नां॒ यो गवां॒ यस्त॒नूना॑म् । रि॒पुः स्ते॒नः स्ते॑य॒कृद्द॒भ्रमे॑तु॒ नि ष ही॑यतां त॒न्वा॒३॒॑ तना॑ च ॥

English Transliteration

yo no rasaṁ dipsati pitvo agne yo aśvānāṁ yo gavāṁ yas tanūnām | ripuḥ stenaḥ steyakṛd dabhram etu ni ṣa hīyatāṁ tanvā tanā ca ||

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Pad Path

यः । नः॒ । रस॑म् । दिप्स॑ति । पि॒त्वः । अ॒ग्ने॒ । यः । अश्वा॑नाम् । यः । गवा॑म् । यः । त॒नूना॑म् । रि॒पुः । स्ते॒नः । स्ते॒य॒ऽकृत् । द॒भ्रम् । ए॒तु॒ । नि । सः । ही॒य॒ता॒म् । त॒न्वा॑ । तना॑ । च॒ ॥ ७.१०४.१०

Rigveda » Mandal:7» Sukta:104» Mantra:10 | Ashtak:5» Adhyay:7» Varga:6» Mantra:5 | Mandal:7» Anuvak:6» Mantra:10


ARYAMUNI

Word-Meaning: - (अग्ने) हे तेजःस्वरूप परमात्मन् ! (यः) जो राक्षस (नः) हमारे (पित्वः) अन्न के (रसम्) रसको (दिप्सति) नष्ट करना चाहता है और (यः) जो (अश्वानाम्) घोड़ों के तथा (यः, गवाम्) जो गौओं के तथा (यः, तनूनाम्) जो शरीर के रस अर्थात् बल को नष्ट करना चाहता है, वह (रिपुः) अहिताभिलाषी (स्तेनः) चोर तथा (स्तेयकृत्) छिप कर हानि करनेवाला (दभ्रम्, एतु) नाश को प्राप्त हो (सः) और वह दुष्ट (तन्वा) अपने शरीर से तथा (तना) दुष्कर्मी सन्तानों से (नि, हीयताम्) नष्ट हो जाय ॥१०॥
Connotation: - हे ज्ञानस्वरूप परमात्मन् ! आप ऐसे राक्षसों को सदैव नाश को प्राप्त करें, जो धर्मचारी पुरुषों के बल, वीर्य और ऐश्वर्य को छिप कर वा किसी कुनीति से नाश करते हैं ॥१०॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

मृत्युदण्ड की व्यवस्था

Word-Meaning: - पदार्थ- हे (अग्ने) = अग्निवत् तेजस्विन्! (यः) = जो दुष्ट पुरुष (नः) = हमारे (पित्वः रसं) = अन्न के रस, सारभाग को (दिप्सति) = नष्ट करना चाहता है और (यः) = जो हमारे (अश्वनां) = घोड़ों, (गवां) = गौओं, और (तनूनां) = शरीरों के (रसं) = सारवान् बलयुक्त अंश को नाश करता है वह (रिपुः) = शत्रु, (स्तेनः) = चोर (स्तेयकृत्) = चोरी करनेवाला, पुरुष (दभ्रम् एतु) = पीड़ा वा मृत्युदण्ड को प्राप्त हो और (स:) = वह (तन्वा) = शरीर और (तना च) = पुत्रादि से (नि हीयताम्) = वञ्चित रहे।
Connotation: - भावार्थ- जो दुष्ट प्रजाजनों के अन्नादि खाद्य पदार्थों को नष्ट करे, उनके पशुओं को मारे, उनके परिजनों को मारे या व्यभिचार करे ऐसे दुष्ट को राजा मृत्युदण्ड देवे।

ARYAMUNI

Word-Meaning: - (अग्ने) हे तेजःस्वरूप परमात्मन् ! (यः) यो राक्षसः (नः) अस्माकम् (पित्वः) अन्नस्य (रसम्) रसं तत्रत्यं सारं (दिप्सति) विनाशयिषति (यः) यश्च (अश्वानाम्) वाजिनां (यः, गवाम्) यश्च गवां (यः, तनूनाम्) यश्चास्माकं शरीराणां रसं दिप्सति (रिपुः) स शत्रुः (स्तेनः) चौरः (स्तेयकृत्) गूढवृत्त्या हानिकरः (दभ्रम्, एतु) नाशं गच्छतु (सः) स दुष्टः (तन्वा) स्वशरीरेण तथा (तना) दुःसन्तानेन सह (निहीयताम्) प्रणश्यतु ॥१०॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Whoever pollutes the flavour, taste and vitality of our food and injures or impairs the vigour and power of our horses, cows and our bodies, let such an enemy, the thief, the robber and saboteur, O lord of light and vitality, Agni, be reduced to nullity and himself suffer debility of body and even deprivation from self extension and further growth.