Go To Mantra
Viewed 472 times

धाम॑न्ते॒ विश्वं॒ भुव॑न॒मधि॑ श्रि॒तम॒न्तः स॑मु॒द्रे ह्य॒द्य१॒॑न्तरायु॑षि। अ॒पामनी॑के समि॒थे य आभृ॑त॒स्तम॑श्याम॒ मधु॑मन्तं त ऊ॒र्मिम् ॥११॥

English Transliteration

dhāman te viśvam bhuvanam adhi śritam antaḥ samudre hṛdy antar āyuṣi | apām anīke samithe ya ābhṛtas tam aśyāma madhumantaṁ ta ūrmim ||

Mantra Audio
Pad Path

धाम॑न्। ते॒। विश्व॑म्। भुव॑नम्। अधि॑। श्रि॒तम्। अ॒न्तरिति॑। स॒मु॒द्रे। हृ॒दि। अ॒न्तः। आयु॑षि। अ॒पाम्। अनी॑के। स॒म्ऽइ॒थे। यः। आऽभृ॑तः। तम्। अ॒श्या॒म॒। मधु॑ऽमन्तम्। ते॒। ऊ॒र्मिम् ॥११॥

Rigveda » Mandal:4» Sukta:58» Mantra:11 | Ashtak:3» Adhyay:8» Varga:11» Mantra:6 | Mandal:4» Anuvak:5» Mantra:11


SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर ईश्वर के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

Word-Meaning: - हे भगवन् ! जिस (ते) आपके (धामन्) आधाररूप (अन्तः) मध्य (समुद्रे) अन्तरिक्ष और (हृदि) हृदय के (अन्तः) मध्य में (आयुषि) जीवन के निमित्त प्राण में (अपाम्) प्राणों की (अभीके) सेना में और (समिथे) संग्राम में (विश्वम्) सम्पूर्ण (भुवनम्) जगत् (अधि) ऊपर (श्रितम्) स्थित है तथा (यः) जो (ते) आप का विद्वानों से (आभृतः) सब प्रकार धारण किया गया (तम्) उस (मधुमन्तम्) माधुर्य्यगुण से युक्त (उर्मिम्) रक्षा आदि व्यवहार और आनन्द को हम लोग (अश्याम) प्राप्त होवें, उस आपकी उपासना को निरन्तर करें ॥११॥
Connotation: - हे मनुष्यो ! जो जगदीश्वर जगत् को अभिव्याप्त होके सब को धारण कर और उत्तम प्रकार रक्षा करके अन्तर्य्यामिरूप से सर्वत्र व्याप्त है और जिसकी कृपा से विज्ञान, बहुत कालपर्य्यन्त जीवन और विजय प्राप्त होता है, उसी की निरन्तर सेवा करो ॥११॥ इस सूक्त में जल मेघ सूर्य वाणी विद्वान् और ईश्वर के गुणवर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की पिछिले सूक्तार्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये ॥११॥ यह श्रीमान् परमहंसपरिव्राजकाचार्य परमविद्वान् श्रीमद्विरजानन्दसरस्वती स्वामीजी के शिष्य श्रीमान् दयानदसरस्वती स्वामीजी के बनाए हुए, संस्कृत और आर्य्यभाषा से सुशोभित, ऋग्वेदभाष्य के चतुर्थमण्डल में पञ्चम अनुवाक, अट्ठावनवाँ सूक्त और ग्यारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥ इति चतुर्थं मण्डलम् ॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

ज्ञान किसे प्राप्त होता है ?

Word-Meaning: - (१) हे प्रभो ! (ते धामनि) = आपके तेज में (विश्वं भुवनम्) = सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड (अधिश्रितम्) = आश्रित हुआ हुआ है। हम (ते) = आपके (मधुमन्तम्) = माधुर्यवाले जीवन को मधुर बनानेवाले (ऊर्मिम्) = ज्ञानप्रकाश को (अश्याम) = प्राप्त करें। [२] (तम्) = उस ज्ञान के प्रकाश को प्राप्त करें, (यः) = जो कि (समुद्रे हृदि अन्तः) = [स- मुद्] प्रसन्नतावाले हृदय के अन्दर (आभृतः) = धारण किया गया है। (आयुषि:) = गतिशील जीवन में जो धारण किया गया है। (अपाम्) = शरीरस्थ रेत: कणों के (अनीके) = बल में जो धारण किया गया है, रेत: कणों के रक्षण के होने पर जो प्राप्त होता है, इन रेतः कणों ने ही तो ज्ञानाग्नि का ईंधन बनना होता है। (समिथे) = संग्राम में जो धारण किया गया है। अध्यात्म संग्राम में काम-क्रोध आदि पर विजय प्राप्त करके जिसे पाया जाता है।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु ही सर्वाधार हैं। हमें प्रभु का वह ज्ञान प्राप्त हो, जो कि प्रसन्न हृदयवाले पुरुष को, गतिशील जीवनवाले को, सोमरक्षक व अध्यात्म-संग्राम विजेता को प्राप्त होता है। इस ज्ञान को प्राप्त करनेवाला व्यक्ति 'बुध' बनता है। यह ज्ञान की वाणियों में स्थिर होने से 'गविष्ठिर' कहलाता है। पञ्चम मण्डल का प्रारम्भ इन ऋषियों के सूक्त से ही होता है। ये आत्रेय हैं ज्ञान के कारण 'काम-क्रोध-लोभ' इन तीनों से ऊपर उठे हुए हैं। ये अपने जीवन मात्र को निरन्तर आगे बढ़ाते हुए 'अग्नि' होते हैं। अग्नि ही इस प्रथम सूक्त का देवता है।

SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनरीश्वरविषयमाह ॥

Anvay:

हे भगवन् ! यस्य ते धामन्नन्तः समुद्रे हृद्यन्तरायुष्यपामनीके समिथे विश्वं भुवनमधि श्रितं यस्ते विद्वद्भिराभृतस्तं मधुमन्तमूर्मिमानन्दं वयमश्याम तदुपासनां सततं कुर्य्याम ॥११॥

Word-Meaning: - (धामन्) आधारे (ते) तव (विश्वम्) सर्वम् (भुवनम्) जगत् (अधि) उपरि (श्रितम्) स्थितम् (अन्तः) (समुद्रे) अन्तरिक्षे (हृदि) हृदये (अन्तः) मध्ये (आयुषि) जीवननिमित्ते प्राणे (अपाम्) प्राणानाम् (अभीके) सैन्ये (समिथे) सङ्ग्रामे (यः) (आभृतः) समन्ताद् धृतः (तम्) (अश्याम) प्राप्नुयाम (मधुमन्तम्) माधुर्य्यगुणोपेतम् (ते) तव (ऊर्मिम्) रक्षणादिकम् ॥११॥
Connotation: - हे मनुष्या ! यो जगदीश्वरो जगदभिव्याप्य सर्वं धृत्वा संरक्ष्यान्तर्यामिरूपेण सर्वत्र व्याप्तोऽस्ति यस्य कृपया विज्ञानं चिरजीवनं विजयश्च प्राप्यते तमेव सततं भजतेति ॥११॥ अत्रोदकमेघसूर्यवाग्विद्वदीश्वरगुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिरस्तीति वेद्यम् ॥११॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्याणां परमविदुषां श्रीमद्विरजानन्दसरस्वतीस्वामिनां शिष्येण दयानदसरस्वतीस्वामिना निर्मिते संस्कृतार्य्यभाषाभ्यां विभूषित ऋग्वेदभाष्ये चतुर्थमण्डले पञ्चमोऽनुवाकोऽष्टपञ्चाशत्तमं सूक्तमेकादशो वर्गश्च समाप्तः ॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - O Lord, within your presence by your power is sustained the entire world of existence. That same power and presence vibrates in the depths of the oceans, in the cave of the heart, in the breath of life and age, in the waves of water and energy, in the vibrations of thought, and in the heat of action in nature and humanity. That power and presence vibrating in existence, O Lord, we pray, let us realise. Let us flow with that constant flow of vibration of Divinity in and across the fluctuations of mutability.

ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA

The knowledge about God is imparted.

Anvay:

O God! this whole universe depends upon Your power and might. It is vast like the atmosphere and pervades the ocean or firmament of our heart. It dwells within the army of our Pranas and even battle-fields of good and evil. May we enjoy that Bliss of protection which is upheld by the enlightened persons? May we always have communion with you.

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - O men ! always worship that One God, Who pervades the world, upholds and preserves all as an Indwelling Spirit and by Whose Grace, there is development and growth of knowledge, long life and victory.

MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - हे माणसांनो! जो जगदीश्वर जगात अभिव्याप्त होऊन सर्वांना धारण करून उत्तम प्रकारे रक्षण करून अन्तर्यायी रूपाने सर्वत्र व्याप्त आहे व ज्याच्या कृपेने विज्ञान, दीर्घायुुष्य व विजय मिळतो त्याचीच निरंतर सेवा करा. ॥ ११ ॥