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यज्जा॑तवेदो॒ भुव॑नस्य मू॒र्धन्नति॑ष्ठो अग्ने स॒ह रो॑च॒नेन॑ । तं त्वा॑हेम म॒तिभि॑र्गी॒र्भिरु॒क्थैः स य॒ज्ञियो॑ अभवो रोदसि॒प्राः ॥

English Transliteration

yaj jātavedo bhuvanasya mūrdhann atiṣṭho agne saha rocanena | taṁ tvāhema matibhir gīrbhir ukthaiḥ sa yajñiyo abhavo rodasiprāḥ ||

Pad Path

यत् । जा॒त॒ऽवे॒दः॒ । भुव॑नस्य । मू॒र्धन् । अति॑ष्ठः । अ॒ग्ने॒ । स॒ह । रो॒च॒नेन॑ । तम् । त्वा॒ । अ॒हे॒म॒ । म॒तिऽभिः॑ । गीः॒ऽभिः । उ॒क्थैः । सः । य॒ज्ञियः॑ । अ॒भ॒वः॒ । रो॒द॒सि॒ऽप्राः ॥ १०.८८.५

Rigveda » Mandal:10» Sukta:88» Mantra:5 | Ashtak:8» Adhyay:4» Varga:10» Mantra:5 | Mandal:10» Anuvak:7» Mantra:5


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (जातवेदः-अग्ने) हे जातप्रज्ञान-सर्वत्र नायक परमात्मन् ! (यत्) जिससे तू (रोचनेन सह) स्वकीय ज्ञानप्रकाश के साथ (भुवनस्य) प्राणिमात्र के (मूर्धन्) मूर्धा पर शिरोधार्य शासक हुआ (अतिष्ठः) स्थित है, (तं त्वा) उस तुझ को (मतिभिः-गीर्भिः) मननीय क्रियाओं से तथा स्तुतियों से (उक्थैः) प्रशंसावचनों से (अहेम) हम प्राप्त करें, (सः) वह तू (रोदसिप्राः) द्यावापृथिवीमय जगत् को अपनी व्याप्ति से पूरण करनेवाला संगमनीय है ॥५॥
Connotation: - परमात्मा समस्त संसार में व्याप्त है तथा प्राणिमात्र के ऊपर शासन करता है, उसे मननप्रकारों स्तुति प्रशंसाओं द्वारा प्राप्त किया जाता है ॥५॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

मनन, स्वाध्याय व स्तवन

Word-Meaning: - [१] हे (जातवेदः) = सर्वज्ञ ! (अग्ने) = अग्रेणी प्रभो ! (यत्) = जो आप (रोचनेन सह) = ज्ञान की दीसि के साथ (भुवनस्य मूर्धन्) = इस ब्रह्माण्ड के शिखर पर (अतिष्ठः) = स्थित होते हैं । अर्थात् सारे ब्रह्माण्ड के शिरोमणि हैं, इसके शासक हैं और सभी को ज्ञान दे रहे हैं। (तं त्वा) = उन आपको (मतिभिः) = मननों के द्वारा, (गीभिः) = ज्ञान की वाणियों के द्वारा (उक्थैः) = स्तोत्रों के द्वारा, अर्थात् हृदय में चिन्तन, मस्तिष्क में ज्ञान व वाणी में स्तुतिवचनों के धारण के द्वारा (अहेम) = प्राप्त होती हैं । प्रभु ब्रह्माण्ड में सर्वश्रेष्ठ हैं, उनको प्राप्त करने के लिये मनन [मतिभिः] स्वाध्याय [ गीर्भिः] तथा स्तवन [उक्थैः] आवश्यक है । [२] (स) = वे आप (यज्ञियः) = पूजा के योग्य (अभवः) = हैं । (रोदसिप्राः) = द्यावापृथिवी का पूरण करनेवाले हैं। सारे ब्रह्माण्ड में व्याप्त हैं, कण-कण में आपकी सत्ता है ।
Connotation: - भावार्थ- संसार के संचालक प्रभु की प्राप्ति 'मनन, स्वाध्याय व स्तवन' से होती है । वे प्रभु ही पूजा के योग्य हैं, सर्वत्र व्याप्त हैं ।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (जातवेदः-अग्ने) हे जातप्रज्ञान-सर्वज्ञ नायक परमात्मन् ! (यत्) यतस्त्वम् ! (रोचनेन सह) स्वकीयज्ञानप्रकाशेन सह (भुवनस्य मूर्धन्-अतिष्ठ)  प्राणिमात्रस्य मूर्धनि शिरोधार्यः शासकः सन् तिष्ठसि (तं त्वा) तं त्वां (मतिभिः-गीर्भिः) मननक्रियाभिः स्तुतिभिः (उक्थैः-अहेम) प्रशंसावचनैश्च प्राप्नुयाम “हि गतौ” [स्वादि०] (सः) स त्वं (रोदसि प्राः) द्यावापृथिवीमयस्य विश्वस्य पूरयिता सङ्गमनीयो भव ॥५॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - O Jataveda, Agni, who abide and shine on top of the world with the sun, with our thoughts, words and holy songs we adore and worship you. You are adorable, worthy of worship, pervasive all over heaven and earth.