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स॒नाद॑ग्ने मृणसि यातु॒धाना॒न्न त्वा॒ रक्षां॑सि॒ पृत॑नासु जिग्युः । अनु॑ दह स॒हमू॑रान्क्र॒व्यादो॒ मा ते॑ हे॒त्या मु॑क्षत॒ दैव्या॑याः ॥

English Transliteration

sanād agne mṛṇasi yātudhānān na tvā rakṣāṁsi pṛtanāsu jigyuḥ | anu daha sahamūrān kravyādo mā te hetyā mukṣata daivyāyāḥ ||

Pad Path

स॒नात् । अ॒ग्ने॒ । मृ॒ण॒सि॒ । या॒तु॒ऽधाना॑न् । न । त्वा॒ । रक्षां॑सि । पृत॑नासु । जि॒ग्युः॒ । अनु॑ । द॒ह॒ । स॒हऽमू॑रान् । क्र॒व्य॒ऽअदः॑ । मा । ते॒ । हे॒त्याः । मु॒क्ष॒त॒ । दैव्या॑याः ॥ १०.८७.१९

Rigveda » Mandal:10» Sukta:87» Mantra:19 | Ashtak:8» Adhyay:4» Varga:8» Mantra:4 | Mandal:10» Anuvak:7» Mantra:19


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (अग्ने) हे तेजस्वी नायक ! (यातुधानान्) यातनाधारकों को (सनात्-मृणसि) सदा से तू हिंसित करता है (रक्षांसि त्वा पृतनासु न जिग्युः) राक्षस दुष्ट तुझे संग्रामों में नहीं जीतते हैं (क्रव्यादः समूरान्-अनुदह) मांसभक्षकों को समूल अनुक्रम संदग्ध कर (ते दैव्यायाः-हेत्या मा मुक्षत) तेरी विद्युत् से युक्त प्रहार-शक्ति से मुक्त न हों ॥१९॥
Connotation: - सेनानायक ऐसा होना चाहिए, जिसे संग्राम में शत्रुजन जीत न सके। ऐसा वैद्युत अस्त्र चलानेवाला हो, जिससे कोई न बच सके ॥१९॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

ज्ञान- प्रसार व यातुधानत्व का अन्त

Word-Meaning: - [१] हे (अग्ने) = राष्ट्र के अग्रणी राजन् ! तू सनात् चिरकाल से (यातुधानान्) = इन प्रजा व पशुओं के पीड़कों को (मृणसि) = पीड़ित करता है। (त्वा) = तुझे (पृतनासु) = संग्रामों में (रक्षांसि) = ये राक्षसी वृत्ति के लोग (न) = नहीं (जिग्युः) = जीत पाते । [२] तू (क्रव्यादः) = इन मांस भक्षकों को (सहमूरान्) = जड़ समेत (अनुदह) = भस्म कर दे। इनको जड़ समेत भस्म करने का भाव यह है कि 'ये न तो मांस खायें और ना ही इनकी मांस खाने की रुचि रह जाए। विषय जायें, तो विषयरस भी जाये । (ते) = आपके (दैव्यायाः हेत्याः) = दिव्य वज्र से, प्रकाशमय वज्र से (मा मुक्षत) = कोई भी यातुधान मुक्त न रह जाए। ज्ञान प्रकाश के फैलने से उनका यातुधानत्व व क्रव्यादपना ही समाप्त हो जाए।
Connotation: - भावार्थ - राजा राष्ट्र में ज्ञान प्रसार के द्वारा यातुधानत्व को समाप्त करे ।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (अग्ने) हे तेजस्विन् नायक ! (यातुधानान्) यातनाधारकान् (सनात्-मृणसि) सदातनात्-खलु हिंससि “मृण हिंसायाम्” [तुदादि०] (रक्षांसि त्वा पृतनासु न जिग्युः) राक्षसा दुष्टास्त्वां सङ्ग्रामेषु “पृतनाः सङ्ग्रामनाम” [निघ० २।१७] न जयन्ति (क्रव्यादः समूरान्-अनुदह) मांसभक्षकान् समूलान् खल्वनुक्रमेण दग्धीकुरु (ते दैव्यायाः-हेत्या मा मुक्षत) तव विद्युद्युक्तायाः प्रहारिकायाः खलु मुक्ता न भवन्तु ॥१९॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Agni, you destroy the oppressors since time immorial. Never can the evil dominate over you in their battles against the good. Let the flesh eaters alongwith the cruel and wicked be destroyed, and may they never escape the strike of your divine punishment and natural retribution.