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अ॒भा॒गः सन्नप॒ परे॑तो अस्मि॒ तव॒ क्रत्वा॑ तवि॒षस्य॑ प्रचेतः । तं त्वा॑ मन्यो अक्र॒तुर्जि॑हीळा॒हं स्वा त॒नूर्ब॑ल॒देया॑य॒ मेहि॑ ॥

English Transliteration

abhāgaḥ sann apa pareto asmi tava kratvā taviṣasya pracetaḥ | taṁ tvā manyo akratur jihīḻāhaṁ svā tanūr baladeyāya mehi ||

Pad Path

अ॒भा॒गः । सन् । अप॑ । परा॑ऽइतः । अ॒स्मि॒ । तव॑ । क्रत्वा॑ । त॒वि॒षस्य॑ । प्र॒चे॒त॒ इति॑ प्रऽचेतः । तम् । त्वा॒ । म॒न्यो॒ इति॑ । अ॒क्र॒तुः । जि॒ही॒ळ॒ । अ॒हम् । स्वा । त॒नूः । ब॒ल॒ऽदेया॑य । मा॒ । आ । इ॒हि॒ ॥ १०.८३.५

Rigveda » Mandal:10» Sukta:83» Mantra:5 | Ashtak:8» Adhyay:3» Varga:18» Mantra:5 | Mandal:10» Anuvak:6» Mantra:5


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (मन्यो) हे आत्मप्रभाव ! या स्वाभिमान ! (अभागः सन्) तू जिस का भाग नहीं है अर्थात् तुझ से वञ्चित स्वाभिमानरहित (अप परेतः-अस्मि) स्वसत्ता से च्युत आत्मभाव से रहित मैं हूँ (प्रचेतः-तव) सावधान करनेवाले तुझ बलवान् के (क्रत्वा) कर्म से-आचरण से (तं त्वा) उस तुझ को (अक्रतुः) कर्मरहित हुआ (अहं जिहीळ) मैं अपने से विपरीत करता हूँ (बलदेयाय) बल देने के लिए (तनूः-धेहि) मेरे आत्मा में अपने स्वरूप प्रभावों को धारण करा ॥५॥
Connotation: - जो मनुष्य आत्मप्रभाव या स्वाभिमान से रहित होता है, वह यथार्थ कर्म या आचरण से गिर जाता है, इसलिए अपने अन्दर स्वाभिमान को भावित करना चाहीए किसी भी कर्म करने को बल पाने के लिए ॥५॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

दौर्भाग्य !

Word-Meaning: - [१] हे (प्रचेतः) = प्रकृष्ट ज्ञान ! (अ-भागः सन्) = कुछ अल्पभाग्यवाला होता हुआ मैं, बदकिस्मत होता हुआ मैं (तविषस्य) = महान् व शक्तिशाली (तव) = तेरे (क्रत्वा) = कर्म से, अर्थात् ज्ञानसाधक कर्मों से, (अप परेतः अस्मि) = दूर होता हुआ मार्ग से भटक गया हूँ, परे चला गया हूँ। यह मेरे सौभाग्य की कमी है कि मैं ज्ञान प्राप्ति के कर्मों में नहीं लगा रह सका। हे (मन्यो) = ज्ञान ! (तं त्वा) = उस तुझ को (अक्रतुः) = अकर्मण्य होता हुआ मैं (जिहीड) = घृणा करता रहा हूँ । आलस्य के कारण मुझे ज्ञान रुचिकर नहीं हुआ । [२] पर अब मैं समझता हूँ कि आलस्य व अकर्मण्यता से दूर होकर सतत प्रयत्न से ज्ञानोपार्जन करना नितान्त आवश्यक है। सो हे ज्ञान ! (स्वा तनूः) = [ मम शरीरभूतः त्वम् सा० ] अब मेरा शरीर ही बना हुआ तू (बलदेयाय) = बल को देने के लिये (मा इहि) = मुझे प्राप्त हो । ज्ञान मेरा शरीर ही बन जाए, अर्थात् मैं सदा ज्ञान में निवास करनेवाला बनूँ । इसी से मुझे इस संघर्षमय संसार में आनेवाले विघ्नों को सहन करने की शक्ति प्राप्त होगी ।
Connotation: - भावार्थ- सब से बड़ा दौर्भाग्य यह है कि हम ज्ञान प्राप्ति के साधक कर्मों से दूर हो जाते हैं। ज्ञान में ही निवास करने पर वह शक्ति प्राप्त होती है जो कि हमें संसार में आगे बढ़ने में समर्थ करती है ।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (मन्यो-अभागः सन्) हे मन्यो आत्मप्रभाव ! त्वं यस्य भागो नास्ति सोऽभागः स्वाभिमानवञ्चितः सन् (अप परेतः-अस्मि) स्वसत्तातश्च्युतः स्वात्मतः पृथग्गतोऽस्मि (प्रचेतः-तव तविषस्य) प्रचेतयतो बलवतः (क्रत्वा) कर्मणा-आचरणेन (तं त्वा) तं त्वां (अक्रतुः-अहं जिहीळ) कर्मरहितः सन् खल्वहं त्वां स्वतो विपरीतं करोमि (बलदेयाय) बलदानाय (तनूः-धेहि) ममात्मनि स्वरूपप्रभावान् धारय ॥५॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Being void of righteous passion, O spiritual rectitude, giver of self confidence and assertive identity, I am gone far from my own self and, by action, deprived of your spirit of lustre and inspiration. O manyu, O Indra, O Varuna, O Jataveda, I am guilty of remiss toward you, and I pray bless me with the strength of body, mind and soul.