Go To Mantra
Viewed 91 times

उदे॒णीव॑ वार॒ण्य॑भि॒स्कन्धं॑ मृ॒गीव॑। कृ॒त्या क॒र्तार॑मृच्छतु ॥

Mantra Audio
Pad Path

उत् । एणीऽइव । वारणी । अभिऽस्कन्दम् । मृगीऽइव । कृत्या । कर्तारम् । ऋच्छतु ॥१४.११॥

Atharvaveda » Kand:5» Sukta:14» Paryayah:0» Mantra:11


PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

शत्रु के विनाश का उपदेश।

Word-Meaning: - (वारणी) हथिनी, अथवा (एणी इव) कृष्णमृगी के समान (मृगी इव) और मृगी के समान (अभिस्कन्दम्) धावा करनेवाले पुरुष पर, (कृत्या) शत्रुनाशक सेना (कर्तारम्) हिंसक को (उद्) उछल कर (ऋच्छतु) प्राप्त होवे ॥११॥
Connotation: - हमारी सेना शत्रुओं पर इस प्रकार शीघ्र धावा करे, जैसे घेरा हुआ पशु अपने आखेटक पर दौड़ता है ॥११॥
Footnote: ११−(उत्) उद्गत्य (एणी) इण् गतौ−ण, णस्य नेत्वम्, ङीप्। कृष्णमृगी (इव) यथा (वारणी) वृञ् आवरणे−णिच्, ल्युट्, ङीष्। गजी (अभिस्कन्दम्) अभि+स्कन्दिर् गतिशोषणयोः−पचाद्यच्। प्रतिकूलगन्तारम् (मृगी) हरिणी (इव) यथा (कृत्या) शत्रुनाशिका सेना (कर्तारम्) कृञ् हिंसायाम्−तृच्। हिंसकम् (ऋच्छ) गच्छतु ॥