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यः स॒प्तर॑श्मिर्वृष॒भस्तुवि॑ष्मान॒वासृ॑ज॒त्सर्त॑वे स॒प्त सिन्धू॑न्। यो रौ॑हि॒णमस्फु॑र॒द्वज्र॑बाहु॒र्द्यामा॒रोह॑न्तं॒ स ज॑नास॒ इन्द्रः॑ ॥

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Pad Path

य: । सप्तऽरश्मि: । वृषभ: । तुविष्मान् । अवऽअसृजत् । सर्तवे । सप्त । सिन्धून् ॥ य: । रौहिणम् । अस्‍फुरत् । वज्रबाहु: । द्याम् । आऽरोहन्तम् । स: । जनास: । इन्द्र: ॥३४.१३॥

Atharvaveda » Kand:20» Sukta:34» Paryayah:0» Mantra:13


PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

परमेश्वर के गुणों का उपदेश।

Word-Meaning: - (सप्तरश्मिः) सात प्रकार की [शुक्ल, नील, पीत, रक्त, हरित, कपिश और चित्र] किरणोंवाले सूर्य के समान (यः) जिस (वृषभः) सुख की बरसा करनेवाले, (तुविष्मान्) बलवान् ने (सप्त) सात (सिन्धून्) बहते हुए समुद्रों [के समान भूर् आदि सात लोकों] को (सर्तवे) चलने के लिये (अवासृजत्) विमुक्त किया है। और (यः) जिस (वज्रबाहुः) वज्रसमान भुजाओं वाले [दृढ़ शरीरवाले वीरसदृश] ने (द्याम्) आकाश को (आरोहन्तम्) चढ़ते हुए (रौहिणम्) उपजानेवाले बादल को (अस्फुरत्) घुमड़ाया है [घेरा करके चलाया है], (जनासः) हे मनुष्यो ! (सः) वह (इन्द्रः) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाला परमेश्वर] है ॥१३॥
Connotation: - भूर् आदि लोकों के लिये मन्त्र ३ का भावार्थ देखो। जैसे सूर्य अपनी परिधि के लोकों को आकर्षण में रखकर ठहराता है, वैसे ही परमेश्वर सूर्य आदि लोकों को नियम में रखकर चलाता है, और अनावृष्टि हटाकर मेह बरसाकर अन्न आदि उत्पन्न करता है, हे मनुष्यो ! उस परमेश्वर की आज्ञा में चलो ॥१३॥
Footnote: १३−(यः) इन्द्रः (सप्तरश्मिः) अ०९।।१। सप्त आदित्यरश्मयः-निरु०४।२६।शुक्लनीलपीतादिवर्णाः सप्तकिरणाः सन्ति यस्य सः। सूर्यलोक इव। (वृषभः) सुखस्य वर्षिता (तुविष्मान्) बलवान् (अवासृजत्) विमुक्तवान् (सर्तवे) गन्तुम् (सप्त) (सिन्धून्) म०३। स्यन्दमानान् समुद्रान् इव भूरादिसप्तलोकान्, संसारस्यावस्थाविशेषान् (यः) (रौहिणम्) रुहेश्च। उ०२।। रुह बीजजन्मनि प्रादुर्भावे च-इनन्, प्रज्ञादित्वादण्। रौहिणो मेघनाम-निघ०१।१०। उत्पादनशीलं मेघम् (अस्फुरत्) स्फुर संचलने। संचालितवान् (वज्रबाहुः) वज्रवत् सारभूताभ्यां बाहुभ्यामुपेतः शूरुपुरुष इव (द्याम्) आकाशम् (आरोहन्तम्) अधितिष्ठन्तम्। अन्यद् गतम् ॥