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स॑प्तमाष्ट॒माभ्यां॒ स्वाहा॑ ॥

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सप्तमऽअष्टमाभ्याम्। स्वाहा ॥२२.३॥

Atharvaveda » Kand:19» Sukta:22» Paryayah:0» Mantra:3


PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

महाशान्ति के लिये उपदेश।

Word-Meaning: - (सप्तमाष्टमाभ्याम्) सातवें के लिये और आठवें के लिये [भावार्थ देखो] (स्वाहा) स्वाहा [सुन्दर वाणी] हो ॥३॥
Connotation: - यहाँ सातवाँ और आठवाँ पद परमेश्वर के दो गुणों का नाम है। परमेश्वर षड्वर्ग अर्थात् काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य से अलग सातवाँ है। तथा कान, आँख, नाक जिह्वा, त्वचा पाँच ज्ञानेन्द्रिय और मन और चित्त से पृथक् होने से उसको आठवाँ माना है। उसकी उपासना हमें सदा करनी चाहिये ॥३॥
Footnote: ३−(सप्तमाष्टमाभ्याम्) सप्तमश्चाष्टमश्च तौ ताभ्याम्। षड्वर्गेण कामक्रोधलोभमोहमदमात्सर्यैः पृथग्भूताय सप्तमाय, श्रोत्रनेत्रनासिकाजिह्वात्वग्मनश्चित्तैः पृथग् वर्तमानाय अष्टमाय च परमेश्वराय ॥