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सो चि॒न्नुभ॒द्रा क्षु॒मती॒ यश॑स्वत्यु॒षा उ॑वास॒ मन॑वे॒ स्वर्वती।यदी॑मु॒शन्त॑मुश॒तामनु॒ क्रतु॑म॒ग्निं होता॑रं वि॒दथा॑य॒ जीज॑नन् ॥

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Pad Path

सो इति । चित् । नु । भद्रा । क्षुऽमती । यशस्वती । उषा: । उवास । मनवे । स्व:ऽवती । यत् । ईम् । उशन्तम् । उशतम् । अनु । ऋतुम् । अग्निम् । होतारम् । विदथाय । जीजनन् ॥१.२०॥

Atharvaveda » Kand:18» Sukta:1» Paryayah:0» Mantra:20


PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

विद्वानों के कर्त्तव्य का उपदेश।

Word-Meaning: - (सो) वही (चित्)निश्चय करके (नु) अब (भद्रा) कल्याणी, (क्षुमती) अन्नवाली, (यशस्वती) यशवाली, (स्वर्वती) बड़े सुखवाली [वेदवाणी], (उषाः) उषा [प्रभातवेला के समान], (मनवे)मनुष्य के लिये (उवास) प्रकाशमान हुई है। (यत्) क्योंकि (ईम्) इस [वेदवाणी] को (उशन्तम्) चाहनेवाले, (होतारम्) दानी (अग्निम्) विद्वान् पुरुष को (उशताम्)अभिलाषी पुरुषों की (क्रतुम् अनु) बुद्धि के साथ (विदथाय) ज्ञान समाज के लिये (जीजनन्) उन्होंने [विद्वानों ने] उत्पन्न किया है ॥२०॥
Connotation: - परमात्मा ने मनुष्य केकल्याण के लिये वेदवाणी को सूर्य के प्रकाश के समान संसार में प्रकट किया है। जोमनुष्य वेदज्ञाता महाविद्वान् होवे, विद्वान् लोग उसको मुखिया बनाकर समाज का सुखबढ़ावें ॥२०॥
Footnote: २०−(सो) सा-उ। सैव वेदवाणी (चित्) एव (नु) सम्प्रति (भद्रा) कल्याणी (क्षुमती) अन्नवती-निघ० २।७। (यशस्वती) कार्त्तिमती (उषाः) प्रभातवेलारूपावेदवाणी (उवास) वस-लिट्। प्रकाशं कृतवती (मनवे) मनुष्याय (स्वर्वती) सुखवती (यत्) यतः (ईम्) इमां वेदवाणीम् (उशन्तम्) कामयमानम् (उशताम्) कामयमानानाम्।अभिलाषिणाम् (अनु) अनुसृत्य (क्रतुम्) प्रज्ञाम्-निघ० ३।६। (अग्निम्) विद्वांसम् (होतारम्) दातारम् (विदथाय) ज्ञानसमाजाय (जीजनन्) अजीजनन्। उदपादयन् तेविद्वांसः ॥