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तस्य॒व्रात्य॑स्य।योऽस्य॑ पञ्च॒मो व्या॒नस्त ऋ॒तवः॑ ॥

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Pad Path

तस्य । व्रात्यस्य । य: । अस्य । पञ्चम: । विऽआन: । ते । ऋतव: ॥१७.५॥

Atharvaveda » Kand:15» Sukta:17» Paryayah:0» Mantra:5


PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

व्रात्य के सामर्थ्य का उपदेश।

Word-Meaning: - (तस्य) उस (व्रात्यस्य) व्रात्य [सत्यव्रतधारी अतिथि] का−(यः) जो (अस्य) इस [व्रात्य] का (पञ्चमः) पाचवाँ (व्यानः) व्यान [सब शरीर में फैला हुआ वायु] है, (ते) वे (ऋतवः)ऋतुएँ हैं [अर्थात् वह वसन्त आदि ऋतुओं के क्रम और कारण आदि का उपदेश करता है]॥५॥
Connotation: - सत्यव्रतधारी महात्माअतिथि संन्यासी अपने प्रत्येक व्यान वायु की चेष्टा में संसार का उपकार करताहै, जैसे वह प्रथम व्यान में भूमिविद्या, दूसरे में अन्तरिक्षविद्या, तीसरे मेंसूर्यविद्या वा आकाशविद्या, चौथे में नक्षत्रविद्या, पाँचवें में वसन्त आदिऋतुविद्या, छठे में ऋतुओं में उत्पन्न पुष्प फल आदि पदार्थविद्या और सातवें मेंसंवत्सर अर्थात् काल की उपभोगविद्या का उपदेश करता है ॥१-७॥
Footnote: ५−(ऋतवः) वसन्तादीनांक्रमकारणादिबोधः अन्यत् पूर्ववत् स्पष्टं च ॥