PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
अतिथि के सामर्थ्य का उपदेश।
Word-Meaning: - (तस्य) उस (व्रात्यस्य) व्रात्य [सत्यव्रतधारी अतिथि] का−(यः) जो (अस्य) इस [व्रात्य] का (तृतीयः) तीसरा (अपानः) अपान [प्रश्वास] है, (सा) वह (अमावास्या) अमावस्या है [वह दर्शेष्टि है, जिसमें विचारा जाता है कि अमावस के सूर्य और चन्द्रमा एक राशिमें आकर क्या प्रभाव उत्पन्न करते हैं] ॥३॥पूर्णमासेष्टि और दर्शेष्टि के विषयमें देखो-मनु० अ० ४ श्लो० २५ ॥
Connotation: - जैसे सामान्य मनुष्यज्ञानप्राप्ति के लिये पौर्णमासी आदि यज्ञ करके श्रद्धावान् होते हैं, वैसे हीविद्वान् अतिथि संन्यासी उस कार्मिक यज्ञ आदि के स्थान पर अपनी जितेन्द्रियतासे मानसिक यज्ञ करके यज्ञफल प्राप्त करते हैं, अर्थात् ब्रह्मविद्या,ज्योतिषविद्या आदि अनेक विद्याओं का प्रचार करके संसार में प्रतिष्ठा पाते हैं॥१-७॥
Footnote: ३−(अमावास्या) सू० १७म० ९। अमा सह वसतश्चन्द्रार्कौ यत्र, वस निवासे-ण्यत्। कृष्णपक्षशेषतिथिः, तद्दिने चन्द्रार्कावेकराशिस्थौ भवतः। दर्शेष्टिर्यज्ञविशेषः। अन्यत् पूर्ववत्स्पष्टं च ॥
