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गृ॒ह्णामि॑ तेसौभग॒त्वाय॒ हस्तं॒ मया॒ पत्या॑ ज॒रद॑ष्टि॒र्यथासः॑। भगो॑ अर्य॒मा स॑वि॒तापुर॑न्धि॒र्मह्यं॑ त्वादु॒र्गार्ह॑पत्याय दे॒वाः ॥

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Pad Path

गृह्णामि । ते । सौभगऽत्वाय । हस्तम् । मया । पत्या । जरतऽअष्टि: । यथा । अस: । भग: । अर्यमा । सविता । पुरम्ऽधि: । मह्मम्‌ । त्वा । अदु: । गार्हऽपत्याय । देवा: ॥१.५०॥

Atharvaveda » Kand:14» Sukta:1» Paryayah:0» Mantra:50


PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

विवाह संस्कार का उपदेश।

Word-Meaning: - [हे वधू !] (सौभगत्वाय) सौभाग्य [अर्थात् गृहाश्रम में सुख] के लिये (ते हस्तम्) तेरे हाथको (गृह्णामि) मैं [पति] पकड़ता हूँ, (यथा) जिससे (मया पत्या) मुझ पति के साथ (जरदष्टिः) स्तुति के साथ प्रवृत्तिवाली वा भोजनवाली (असः) तू रह। (भगः) सकलऐश्वर्यवाले, (अर्यमा) श्रेष्ठों का मान करनेवाले, (सविता) सबको प्रेरणाकरनेवाले, (पुरन्धिः) सब जगत् को धारण करनेवाले [परमेश्वर] और (देवाः) सबविद्वानों ने (मह्यम्) मुझको (त्वा) तुझे (गार्हपत्याय) गृहकार्य के लिये (अदुः)दिया है ॥५०॥
Connotation: - वधू-वर परमेश्वर औरविद्वानों को साक्षी करके परस्पर हाथ पकड़ कर दृढ़ प्रतिज्ञा करें कि हम दोनोंनिष्कपट परस्पर सहायक होकर परमेश्वर और विद्वानों की मर्यादा पर चलकर गृहाश्रमका कर्तव्य सिद्ध करेंगे ॥५०॥यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१०।८५।३६, औरमहर्षि दयानन्दकृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका विवाहविषय पृष्ठ २०८ में व्याख्यात है॥
Footnote: ५०−(गृह्णामि) (ते) तव (सौभगत्वाय) सुभगत्वाय। गृहाश्रमे सुखप्राप्तये (हस्तम्)पाणिम् (मया) (पत्या) स्वामिना सह (जरदष्टिः) म० ४९। स्तुत्या सहप्रवृत्तियुक्ता भोजनयुक्ता वा (यथा) येन प्रकारेण (असः) त्वं भवेः (भगः)सकलैश्वर्यसम्पन्नः (अर्यमा) श्रेष्ठानां मानकर्ता (सविता) सर्वप्रेरकः (पुरन्धिः) सर्वजगद्धारकः परमेश्वरः (मह्यम्) मदर्थम् (त्वा) त्वां वधूम् (अदुः)दत्तवन्तः (गार्हपत्याय) गृहकार्यसिद्धये (देवाः) विद्वांसः ॥