Go To Mantra
Viewed 65 times

स्यो॒नं ध्रु॒वंप्र॒जायै॑ धारयामि॒ तेऽश्मा॑नं दे॒व्याः पृ॑थि॒व्या उ॒पस्थे॑। तमाति॑ष्ठानु॒माद्या॑ सु॒वर्चा॑ दी॒र्घं त॒ आयुः॑ सवि॒ता कृ॑णोतु ॥

Mantra Audio
Pad Path

स्योनम् । ध्रुवम् । प्रऽजायै । धारयामि । ते । अश्मानम् । देव्या: । पृथिव्या: । उपऽस्थे । तम् । आ । तिष्ठ । अनुऽमाद्या । सुऽवर्चा: । दीर्घम् । ते । आयु: । सविता । कृणोतु ॥१.४७॥

Atharvaveda » Kand:14» Sukta:1» Paryayah:0» Mantra:47


PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

विवाह संस्कार का उपदेश।

Word-Meaning: - (स्योनम्) सुखदायक, (ध्रुवम्) दृढ़ (अश्मानम्) पत्थर को (देव्याः) दिव्य गुणवाली (पृथिव्याः) पृथिवीकी (उपस्थे) गोद में (प्रजायै) प्रजा [सन्तान, सेवक आदि] के निमित्त (ते) तेरेलिये (धारयामि) मैं [पति] रखता हूँ। (अनुमाद्या) निरन्तर हर्ष मनाती हुई और (सुवर्चाः) बड़ी प्रतापवाली तू (तम्) उस [पत्थर] पर (आ तिष्ठ) खड़ी हो, (सविता)सबका उत्पन्न करनेवाला परमेश्वर (ते) तेरी (आयुः) आयु को (दीर्घम्) लम्बी (कृणोतु) करे ॥४७॥
Connotation: - जिस प्रकार पृथिवी परपत्थर पहाड़ दृढ़ होकर रहते हैं, इसी प्रकार वधू-वर दृढ़ प्रतिज्ञा के साथगृहाश्रम को सिद्ध करके आनन्द पावें ॥४७॥इस मन्त्र से वधू को वर शिला पर खड़ाकरावे। महर्षिदयानन्दकृत संस्कारविधि विवाहप्रकरण में वधू के लिये शिला परचढ़ाना अन्य मन्त्र से लिखा है ॥
Footnote: ४७−(स्योनम्) सुखदायकम् (ध्रुवम्) दृढम् (प्रजायै) सन्तानसेवकादिनिमित्ताय (धारयामि) स्थापयामि (ते) तुभ्यम् (अश्मानम्)शिलाखण्डम् (देव्याः) दिव्यगुणवत्याः (पृथिव्याः) (उपस्थे) अङ्के (तम्) अश्मानम् (आ तिष्ठ) आरोह (अनुमाद्या) निरन्तरहर्षयुक्ता (सुवर्चाः) महातेजस्विनी (दीर्घम्) चिरम् (ते) तव (आयुः) जीवनम् (सविता) सर्वोत्पादकः परमेश्वरः (कृणोतु)करोतु ॥